देशी मसालों का मसला गर्मागर्म सर्दियों के मौसम में…

रिपोर्ट :- नीरज अवस्थी

नई दिल्ली :-हम भारतीय अपने मसालेदार खाने के लिए जाने जाते हैं, दुनिया में कहीं भी भारतियों के खाने का जिक्र हो, तो लोग देशी घरेलू मसालों को याद जरूर करते हैं। हजारों साल से हम दुनिया को मसाले भेजते आए। किसी समय दक्षिण भारत की काली मिर्च इतनी मशहूर थी, की उसे काला सोना कहा जाता था। जमाने भर से व्यापारी बेशकीमती काली मिर्च लेने यहाँ आते थे।

भले ही मसालों की समृद्ध परंपरा हो, परंतु हमारा रोजमर्रा का खाना अक्सर सादा ही होता है। भारी मसाले खास व्यंजनों में ही डाले जाने की रवायत रही है। सामान्य तौर पर धनिया, मिर्ची, हल्दी, राई, जीरा, हींग आदि हमारी राम रसोई का हिस्सा होते हैं। कई जगहों पर पांच मसालों से बना पंचफोरन भी रोजाना इस्तेमाल किया जाता है, जिसमे मेथी कलौंजी राई जीरा और सौंफ होती है। स्वाद के साथ साथ हमारे स्वास्थ्य की ताकत भी बढ़ाता है।

परंतु जिन्हें हम देशी घरेलू गरम मसाले या खड़े मसाले कहते हैं, जैसे लौंग, इलायची, दालचीनी, तेजपत्ता, काली मिर्च, करन फूल, जावित्री, जायफल आदि, वो हमारे रोज के खाने का हिस्सा नहीं हैं। त्योहारों पर, छुट्टी के दिन या फिर शादी ब्याव जैसे कार्यक्रमों में बनने वाला खाना गरम मसाला से युक्त रहता है। अर्थात गरम मसाले को हमने विशेष दर्जा दे रखा है। रोज के खाने में बहुत हुआ तो एकाध सब्जी में कभी कभार डल जाता है।

भारत में खड़े मसाले आमतौर पर साबुत ही डालने का प्रचलन रहा हैं, खाते समय इन्हें अलग कर सकते हैं, ताकि मसालों की सिर्फ खुशबू और स्वाद ही आए, मलमल की पोटली बनाकर भी इनका उपयोग किया जाता है। साबुत मसाले पेट मे जाकर ज्यादा गर्म करते हैं सो यह तरीका हर तरह से मुफीद है।

इन्हीं खड़े मसालों को विभिन्न अनुपातों में मिलाकर पीस लिया जाए तो गरम मसाला बन जाता है। हमारे अलग-अलग राज्यों में स्वाद और मौसम के अनुसार गरम मसाले की विभिन्न विधियां हैं, हर एक घर परिवार का अपना जायका होता है। गरम मसाले की कोई एक निश्चित विधि नही कही जा सकती, कहीं छ्ह मसाले पड़ते हैं तो कहीं सत्ताईस।

पिसे हुआ गरम मसाले और खड़े मसालों में फर्क यह है कि खड़े मसालों का सिर्फ अर्क पेट मे जाता है, वहीं पिसा गरम मसाला हम सब्जी आदि के साथ खा जाते हैं, जो कि शरीर में गर्मी उत्पन्न करता है। कई लोगों का पेट भी गरम मसाले से अस्थिर हो जाता है एसिडिटी वगैरह होना तो आम बात है।

पहले घरों में महिलाएं गरम मसाला कूट पीस कर के बनाती थीं, या किसी विश्वासपात्र खास दुकान पर मिल जाया करता। धीरे-धीरे व्यवसायीकरण हावी हुआ तो ब्रांडेड पेकिंग में मिलने लगा। लेकिन इसके साथ और भी बहुत सारे मसाले बाजार में आ गए। किचन किंग, छोले मसाला, चाट मसाला, सांभर मसाला, राजमा मसाला, बिरयानी मसाला और भी जाने क्या-क्या सैकड़ों तरह से। ये सभी कुछ दशकों पहले अस्तित्व में थे ही नहीं। मूल खड़े मसाले ही होते थे, जिन के विभिन्न मिश्रण द्वारा यह सभी व्यंजन बनते थे।

अब रेडीमेड मसालों का जमाना आ गया है, बस नमक मिर्च के साथ मसाला डाल दो अच्छा स्वाद आ जाता है। लेकिन वास्तव में होता यह है कि आजकल रेडिमेड युग में लोग सामान्य मसाले, खड़े मसाले और रेडीमेड मसाले सब एक साथ उपयोग करने लगे हैं। घरों में भी दाल सब्जी सबको पसन्द आये इसके लिए महिलाएँ दाल मसाला, क्विक फ्राई मसाला, सब्जी मसाला, मैगी मसाला आदि एकाध चम्मच डाल देती हैं अक्सर।

होटलों में या शादी पार्टियों में भारी मात्रा में इन मसालों का इस्तेमाल होता है। होटल वाले तो खैर स्वाद के लिए ही खाना बनाते हैं, उनका तो यह व्यापार है, उन्हें खूब मसालेदार बनाना ही पड़ता है। आजकल होटल में खाने का या बाहर नाश्ता करने का प्रचलन भी बढ़ गया है, इस कारण ढेरों मसाले हम खा जाते हैं। पिज़्ज़ा बर्गर पास्ता जैसा विदेशी खाना लोकप्रिय होने के कारण ऑरेगैनो रोजमेरी थाइम आदि विदेशी मसाले भी उपयोग में आने लगे हैं।

पचास साल पहले के लोगों के मुकाबले, आज के लोग कई गुना मसालों का सेवन अधिक करते हैं। समोसे, आलूबड़े, भजिए आदि में गरम मसाले का कोई काम नहीं है, लेकिन उनमें भी भरपूर मात्रा में डाला जाता है। दरअसल अधिक मसाले खाने से हमारी जबान खुरदरी हो गई है, सादी चीजों में लोगों को स्वाद नहीं आता। मसाले सेहत के लिए बहुत अच्छे होते हैं, हर एक के अपने अपने आयुर्वेदिक गुण भी हैं, परंतु अतिरेक में कई तरह की बीमारियों को जन्म देते हैं।

हमें समझना होगा कि, हर मसाला हर चीज में नहीं डाला जा सकता। खीर में इलायची की खुशबू, पुलाव में जावित्री और दालचीनी की महक, कढ़ी में करीपत्ते का स्वाद, दाल में हींग जीरे का तड़का ही पर्याप्त है। आपके खाने में अगर मूल स्वाद नही आ रहा याने भिंडी की सब्जी में भिंडी नही मसाले का ही स्वाद आ रहा है, तो कृपया खानपान में बदलाव लाने पर विचार जरूर कीजिये।

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