कर्मचारियों के जीपीएफ खाते से 1197 करोड़ गायब करने वाली है भाजपा शासित एमसीडी

रिपोर्ट :- नीरज अवस्थी

नई दिल्ली :-आम आदमी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि भाजपा शासित एमसीडी कर्मचारियों के जीपीएफ खाते में जमा 1197 करोड़ गायब करने वाली है। इससे पहले एमसीडी के ट्राइफरकेशन के बाद का 1232 करोड़ रुपया हजम किया जा चुका है और अब ट्राइफरकेशन से पहले का 1197 करोड़ रुपया भी हजम करने की प्लानिंग चल रही है। यह सारा पैसा पहले ही तीनों निगमों के बीच बांटा जा चुका है। एक सरकारी कर्मचारी बेहतर भविष्य के लिए जिंदगी भर जीपीएफ खाते में पैसा जमा करता है, भाजपा के नेता वह पैसा भी चट कर जाना चाहते हैं। सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाते हुए कहा कि आदेश गुप्ता जवाब दें कि जीपीएफ खाते से गायब हुआ यह सारा पैसा कर्मचारियों को कौन देगा। उन्होंने कहा कि एमसीडी के राजस्व के कई स्त्रोत हैं लेकिन सारा पैसा सरकारी खजाने में जाने की बजाय नेताओं और पार्षदों की जेब में जा रहा है।

आम आदमी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता और ग्रेटर कैलाश से विधायक सौरभ भारद्वाज ने शनिवार को पार्टी मुख्यालय में प्रेसवार्ता को संबोधित किया। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि हमने कुछ दिनों पहले एक प्रेसवार्ता करके बताया था कि दिल्ली नगर निगम के कर्मचारियों का जेनरल प्रोविडेंट फंड यानी जीपीएफ का जो पैसा होता है वह एमसीडी हजम कर गई। एमसीडी के विभाजन के बाद नॉर्थ एमसीडी के पास करीब 1232 करोड़ रुपए इकट्ठा हुए। यह पैसा एमसीडी का था भी नहीं। कर्मचारियों की धरोहर का पैसा निगरानी के तौर पर एमसीडी के पास 1232 करोड़ रुपए रखे हुए थे। एक सरकारी कर्मचारी जिंदगी भर जीपीएफ का पैसा यह सोचकर इकट्ठा करता है कि कल को जब मैं रिटायर हो जाऊंगा, तब यह पैसा घर बनाने, गाड़ी खरीदने, बच्चों की शिक्षा और बच्चों की शादी में काम आएगा। वह पैसा एमसीडी हजम कर गई। उस खाते में जिसमें 1232 करोड़ रुपए होने चाहिए थे, उसमें मात्र 6 करोड़ रुपए ही बचे हैं। हमने आदेश गुप्ता जी से पूछा था कि यह 1232 करोड़ रुपए कौन हजम कर गया। और जो कर्मचारी रिटायर हुए हैं, अब वह पैसा उन्हें कौन देगा। एमसीडी में जो भी कर्मचारी रिटायर हुए हैं, उनको जीपीएफ का पैसा नहीं दिया जा रहा है।

कल हमने बताया था कि चाहे कहीं की कोई भी सरकार हो, उसकी जो भी आमदानी होती है, वह या तो सरकारी खजाने में जाता है और या तो नेताओं की जेब में जाता है। निगम में देखा जा रहा है कि जो भी राजस्व के स्त्रोत थे, टोल-टैक्स आमदनी का एक बहुत बड़ा स्त्रोत था। दिल्ली एक सिटी स्टेट है तो पूरे राज्य का टोल-टैक्स निगम को मिलता था। ऐसा मुश्किल से ही मुम्किन हो पाता है। आप महाराष्ट्र की निगम को देख लीजिए। उसके पास राज्य की सीमा ही नहीं है कि वह टोल ले सके। दिल्ली नगर निगम को 1200 करोड़ रुपए टोल से हासिल होता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से इसका एक तिहाई पैसा ही सरकारी खजाने में जा रहा है क्योंकि बाकी सारा पैसा नेताओं और पार्षदों की जेब में जा रहा है।

हमने बताया कि निगम को सिर्फ होर्डिंग से 12000 करोड़ रुपए का राजस्व आ सकता है लेकिन यह सारा पैसा भी नेताओं की जेब में जा रहा है। यदि आप सभी होर्डिंग देखेंगे तो या तो भारतीय जनता पार्टी के होर्डिंग लगे होंगे या बीजेपी के नेताओं और पार्षदों के होर्डिंग लगे होंगे और या तो मेयर के होर्डिंग लगे होंगे। बस इन्हीं लोगों के होर्डिंग लगे होते हैं। तीसरा मामला आप पार्किंग का देख सकते हैं। अवैध पार्किंग चल रही हैं, जिसके कारण सरकारी खजाने में पैसा आने के बजाए नेताओं की जेब में आ रहा है। इसी तरह से कल हमने बिल्डिंग विभाग का मामला उठाया था। जिसका रेवेन्यू 156 करोड़ से घटकर 37 करोड़ रह गया है। यानी कि अब केवल एक-चौथाई पैसा ही सरकारी खजाने में आ रहा है, बाकी सारा पैसा नेताओं की जेब में जा रहा है।

दस्तावेज पेश करते हुए सौरभ भारद्वाज ने कहा कि आज इसी का एक बहुत बड़ा उदाहरण हमारे हाथ लगा है। एमसीडी के ट्राइफरकेशन यानी कि विभाजन के बाद नॉर्थ एमसीडी 1232 करोड़ रुपया हजम कर गई। जो ट्राइफरकेशन से पहले का पैसा जमा था, कर्मचारियों का जीपीएफ का पैसा जमा था, वह करीब 1197 करोड़ रुपए थे। उसपर काफी दिनों की इनकी नज़र बनी हुई थी कि कैसे इसे खाया जाए। तो तीनों एमसीडी ने इसे आपस में बांटने का फैसला लिया है। इसमें नॉर्थ एमसीडी को 522 करोड़ मिल रहा है, साउथ एमसीडी को 410 करोड़ रुपए मिल रहे हैं और ईस्ट एमसीडी को 212 करोड़ रुपए मिल रहे हैं। हमारा यह आरोप है और हम पूरी जिम्मेदारी से यह आरोप लगा रहे हैं कि यह 1197 करोड़ रुपए भी कर्मचारियों के फंड में से निकालकर एमसीडी अपने खर्चों में लगाने वाली है। एमसीडी के पास जिन सभी स्त्रोंतों से पैसा आता है वह सारा पैसा अब एमसीडी के नेताओं की जेब में जा रहा है। और कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए या तो दिल्ली सरकार के आगे कटोरा लेकर खड़े हो जाते हैं और या तो कोर्ट में कटोरा लेकर खड़े हो जाते हैं।

जीपीएफ और पीएफ की एफडी का पैसा तोड़कर उस पैसे से कर्मचारियों की तनख्वाह दी जाएगी और बाकी जो राजस्व का पैसा है वह नेताओं की जेब में जा रहा है। यह दिसंबर 15, 2021 के दस्तावेज हैं, जिसमें साफ-साफ इन आंकड़ों की पुष्टि की गई है। बहुत जल्द यह सारा पैसा एमसीडी के जीपीएफ अकाउंट से गायब होने वाला है।

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