वट सावित्री का वर्त क्यों रखा जाता है, जाने पूजन विधि, शुभ मुहूर्त और कथा

रिपोर्ट :- शिल्पा

नई दिल्ली : जून के महीने में अमावस्या तिथि को वट सावित्री व्रत करने की परंपरा होती है। इस दिन सभी महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए वट सावित्री का व्रत रखती हैं और बड़ के पेड़ की पूजा भी करती है। इस व्रत का महत्व करवा चौथ और तीज के जैसा ही होता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु की कामना के साथ पर और भटके यानी कि बरगद के पेड़ की पूजा अर्चना करती है। खास बात है कि इस बार बार सावित्री के दिन इस साल का पहला सूर्य ग्रहण पड़ रहा है ऐसे में लोगों को पूजा के शुभ मुहूर्त को लेकर थोड़ा असमंजस है। आइए आपको वट सावित्री व्रत की शुभ मुहूर्त, सामग्री, कथा, पूजन विधि के बारे में बताते हैं।

शुभ मुहूर्त- गुरुवार, 10 जून शाम 4 बजकर 22 तक अमावस्या तिथि है इस दौरान साल का पहला सूर्य ग्रहण 1 बजकर 42 मिनट पर शुरू हो जाएगा और शाम 6 बजकर 41 मिनट तक रहेगा।जबकि शाम 4 बजकर 24 मिनट पर शनि जयंती समाप्त होगी। ऐसे में वट सावित्री व्रत की पूजा शाम 04 बजकर 58 तक ही रहेगी।

पूजन विधि-इस व्रत में वट वृक्ष की पूजा की जाती है महिलाएं अखंड सौभाग्य व परिवार की समृद्धि के लिए यह व्रत करती है। महिलाएं वर्ष की परिक्रमा करते समय 108 बार से लपेटा जाता है महिलाएं सावित्री सत्यवान की कथा सुनती है।सावित्री कथा को सुनने से मनोरथ पूर्ण से होता है और विपदा दूर होती है।

पूजा की सामग्री-हल्दी, सोलह सिंगार, कलावा, तांबे के लोटे में पानी, पूजा के लिए साफ सिंदूर, चढ़ावे के लिए पकवान, अक्षत, बांस की लकड़ी का पंखा, अगरबत्ती, लाल व पीले रंग का कलावा, पांच प्रकार के फल, बरगद का पेड़, लाल रंग का वस्त्र आदि।

मद्रदेश में अश्वपति नाम के धर्मात्मा राजा राज्य करते थे।उनके संतान नही थे। राजा ने संतान हेतु यज्ञ करवाया। कुछ समय के बाद उन्हें कन्या की प्राप्ति हुई। उसका नाम उन्होंने सावित्री रखा। विवाह के होने योग्य होने पर सावित्री को पर खोजने के लिए कहा गया तो उसने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पतिरूप में वरण किया। यह बात जब नारद जी को मालूम हुई तो वे राजा अश्वपति से बोले कि सत्यवान की आयु कम है और एक वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हो जायेगी। नारद जी की बात सुनकर उन्होंने पुत्री को समझाया,पर सावित्री सत्यवान को ही पति रूप में पाने के लिए अडिग रही। सावित्री के अड़े रहने पर आखिरकार राजा अश्वपति ने सावित्री और सत्यवान का विवाह करा दिया।सावित्री सास-ससुर और पति की सेवा में लगी रही।

नारद जी ने मृत्यु का जो दिन बताया था, उस दिन सावित्री भी सत्यवान के साथ वन को चली गई. वन में सत्यवान ज्योंहि पेड़ पर चढ़ने लगा, उसके सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी। वह सावित्री की गोद में अपना सिर रखकर लेट गया। थोड़ी देर बाद सावित्री ने देखा कि अनेक दूतों के साथ हाथ में पाश लिए यमराज खड़े हैं। यमराज सत्यवान के अंगुप्रमाण जीव को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। सावित्री को आते देख यमराज ने कहा, ‘हे पतिपरायणे! जहां तक मनुष्य साथ दे सकता है, तुमने अपने पति का साथ दे दिया. अब तुम लौट जाओ।’ सावित्री ने कहा, ‘जहां तक मेरे पति जाएंगे, वहां तक मुझे जाना चाहिए। यमराज ने सावित्री की धर्मपरायण वाणी सुनकर वर मांगने को कहा। सावित्री ने कहा, ‘मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें नेत्र-ज्योति दें।’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जाने को कहा, किंतु सावित्री उसी प्रकार यम के पीछे चलती रही।

यमराज ने उससे पुन: वर मांगने को कहा। सावित्री ने वर मांगा, ‘मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए।’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जाने को कहा, परंतु सावित्री अडिग रही। सावित्री की पति भक्ति व निष्ठा देखकर यमराज पिघल गए. उन्होंने एक और वर मांगने के लिए कहा। तब सावित्री ने वर मांगा, ‘मैं सत्यवान के पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। कृपा कर आप मुझे यह वरदान दें।’ सावित्री की पति-भक्ति से प्रसन्न हो इस अंतिम वरदान को देते हुए यमराज ने सत्यवान को पाश से मुक्त कर दिया और अदृश्य हो गए।सावित्री अब उसी वट वृक्ष के पास आई। वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव का संचार हुआ और वह उठकर बैठ गया।सत्यवान के माता-पिता की आंखें ठीक हो गईं और खोया हुआ राज्य वापस मिल गया।
इसलिए वट की पूजा की जाती है।

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